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Poem By Mehar Afroz

ایک احساس احباب کی زریں بصارتوں کی نذر
“دل میرا بیراگی ہوا “

دل میرا بیراگی ہے .
دوست ہوئے خودغرض.
آنتوں کے ٹکڑوں کی، تمام ضرورتیں ہوئیں پوری .
ہوگیےء وہ خود مختار
اپنے پیروں پر کھڑے ہونے کا نشہّ خودمختار بنا دیتا ہے .
سارے دلدار لگ گیےء دوجے پار ،
کویء اور بہتر دلدار مل گیا ہوگا
مجھ دل آزار کی کیا ضرورت ہے؟
کھولا اخبار !!
ہر طرف ہاہاکار !
قتل و خون کی خبریں
لہولہو ہے ہر اخبار!!
لوٹ کھسوٹ، عصمت دری
ناداروں پر حملہ ۔
دل ہوا بیزار
حکمرانوں کی لوٹ کھسوٹ ،
عوام کی درد بھری چیخیں
سسکیاں بھرتی بچی، زخمی دامن تار تار !!!
سینہ کوبی کرتی مائیں !
دلدوز چیخیں!
چاروں اور ہے ہاہا کار !
مگر !کیوں دل بے حس ہے
کویء درد اثر نہیں کرتا !
انکھیاں ویران !
سوکھے سوتے،
خشک ہوگیےء آنسو بھنڈار !
دل ہوا بیراگی
جس پر کویء آہ ہے بیکار .
دل خالی
درد، محبت ،خلش چبھن سے .
چاہے
ریت پھانکنا، آتش پینا
اور سوجانا
دل بیراگی
ڈھونڈے کویء ایسا میت
جو درد جگاےء، اسے رلاےء
چبھن جگاےء .
زندہ کردے ہر احساس !
دل بیراگی!
ڈھونڈے سچا میت
جو اسم پھونک کر کویء
جلا دے اسکے اندر آتش دان
سوز نہانی، کرب زمانی
احساس یگانہ، پالنہار
چل بیراگی دل! اس کے دوار
جو تجھکو دیدے درد کی نیء سوغات
دل بیراگی چل اس دوار!!!!!!
مہر افروز,/p>

एक अहसास अहबाब की ज़ररीं बसारतों की नज़्र ।
“दिल मेरा बैरागी हुआ”

दिल मेरा बैरागी है
दोस्त हुए ख़ुद-ग़र्ज़
आंतों के टुकड़ों की,तमाम ज़रूरतें हुईं पूरी
हो गए वो ख़ुद-मुख़्तार
अपने पैरों पर खड़े होने का नशशा
ख़ुद-मुख़्तार बना देता है
सारे दिलदार लग गये दूजे पार,
कोई और बेहतर दिलदार मिल गया होगा
मुझ दिल-आज़ार की क्या ज़रूरत है ?
खोला अख़बार !!
हर तरफ़ हा हा-कार !
क़त्लो-ख़ून की ख़बरें
लहू लहू है हर अख़बार !!
लूट-खसोट, इस्मत-दरी नादारों पर हमला
दिल हुआ बेज़ार
हुक्मरानों की लूट-खसोट, अवाम की दर्द भरी चीख़ें
सिसकियाँ भरती बचची ज़ख़्मी दामन तार-तार !!!
सीना-कोबी करती माएँ !
दिल-दोज़ चीख़ें !
चारों और है हाहा -कार !
मगर ! क्यूँ दिल बे-हिस है
कोई दर्द असर नहीं करता !
अंखियां वीरान !
सूखे सोते, ख़ुश्क़ हो गये आँसू भण्डार !
दिल हुआ बैरागी
जिस पर कोई आह है बेकार
दिल ख़ाली दर्द, मुहब्बत,ख़लिश चुभन से .
चाहे
रेत फांकता, आतिश पीना और सो जाना
दिल बैरागी
ढूंढे कोई ऐसा मीत
जो दर्द जगाये, उसे रुलाये, चुभन जगाये
ज़िन्दा कर दे हर अहसास !
दिल बैरागी !
ढूंढे सच्चा मीत
जो इस्म फूँक कर कोई
जला दे उसके अंदर आतिश-दान
सोज़-निहानी, कर्ब-ज़मानी
अहसास यगाना, पालनहार
चल बैरागी दिल ! उसी के द्वार
जो तुझको देदे दर्द की नयी सौग़ात
दिल बैरागी चल उस द्वार !!!!!!

“महर अफ़रोज़”

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